नीरजा के माता-पिता के मुताबिक़ उनके ज़्यादा दोस्त नहीं थे. उनके पिता रूपल सिंह मिट्टी वाले फर्श पर बैठे हैं और अपनी बेटी की दसवीं की मार्कशीट दिखाते हैं.
वे कहते हैं, "उसने अब तक हर
परीक्षा एक ही बार में पास की थी. वो कहा करती थी कि डॉक्टर बनना है. इसलिए
हमलोगों ने सोचा था कि उसकी मदद करने के लिए हम जो कर सकते हैं वो सब करेंगे."
गांव में रुचिता का घर खोजनेमें कोई मुश्किल नहीं हुई. जब हम उनके घर पहुंचे तो उसकी मां, भाभी और दादी शादी वाले एल्बम की तस्वीरें देख रही थीं.
रुचिता की मां चंद्रैया ने रोते हुए बताया, "ये हमारे बेटे की शादी का एल्बम है. हमारे पास रुचिता की यही अच्छी तस्वीरें हैं."
रुचिता के दादा बेगैया भी आकर बैठ जाते हैं. वे कहते हैं कि रुचिता को काफी लाड़ प्यार में पली थी. परिवार और आसपड़ोस में सब उसको पसंद करते थे.
अपने आंसू पोछते हुए दादा जी बताते हैं, "उसे देखने में मुश्किल होती थी. इसलिए हमलोग उसे काफी प्यार करते थे. उसके पिता का कहना था कि इंटरमीडिएट के बाद अगर उसने ग्रैजुएशन पूरा कर लिया तो उसको नौकरी
मिल सकती है. तब वो आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर हो जाती."
चंद्रैया बताती हैं कि रुचिता को परीक्षा पास करने का पूरा
भरोसा था. वो बताती हैं, "परीक्षा देने के बाद उसने कहा था कि वह सभी पेपर
में पास कर लेगी. वह ग्रैजुएशन की पढ़ाई के लिए कॉलेज जाने की तैयारी करने लगी थी."
हमलोग वहीं थे तभी बच्चों का एक ग्रुप हमारे पास आ
गया. ये छह से आठ साल के बच्चे थे. उन बच्चों ने बताया कि रुचिता अक्का
(दीदी) उनकी दोस्त थीं और उन्हें पता नहीं कि उन सबको बिना बताए वो कहां
चली गई हैं.
रुचिता के दादा बेगैया बताते हैं कि रिजल्ट आने के बाद रुचिता ने इन बच्चों में चार बच्चों को दुलार करने आई थी. "वो
आखिरी बार था जब हमने उसे
देखा था."
देर शाम हो चुकी थी जब हमलोग प्रशांत के गांव पहुंचे. गांव के सामुदायिक केंद्र पर उसके दोस्तों ने श्रद्धांजलि वाला बैनर लगा रखा था. वे हमें प्रशांत के घर ले गए. उनके एक दोस्त अनिल ने अपना मोबाइल निकाला और
हमलोगों को की तस्वीरें दिखाईं.
अनिल ने कहा, "वो हमारे
ग्रुप का सबसे गुड लुकिंग लड़का था. वह हमलोगों के साथ घूमता फिरता था. वो
हमेशा कहा करता था कि हमें अपने माता-पिता की देखभाल करनी चाहिए."
तेलंगाना
में इंटरमीडिएट की परीक्षा के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों की संख्या
2015 में पांच थी, ये 2018 में बढ़कर 23 हो गई है. इस साल परीक्षा में मार्क्स देने की प्रक्रिया में हुई गलती की ख़बरों के चलते भी वैसे मां-बाप
गुस्से और निराशा से भरे हैं जिनके बच्चों ने मौत को गले लगा लिया है.
हम जिन माता पिताओं से मिले, उनमें से अधिकांश ने हमें बताया कि उनकी ओर से
बच्चों पर कोई दबाव नहीं था. आत्महत्या करने वाले कुछ बच्चों ने दसवीं में
70 प्रतिशत या उससे अधिक अंक हासिल किए थे.
अरुतला गणेश ने
अपनी बेटी अनामिका को खो दिया, जो इंटर के पहले साल की परीक्षा में तेलुगू में फेल हो गई थीं. अरुतला को कॉपी जांचने की प्रक्रिया पर संदेह है. वो नाव्या का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि नाव्या को पहले तेलुगू में शून्य अंक मिला था लेकिन फिर से जांच किए जाने के बाद उसे 99 अंक दिए गए.
वेन्नेला
के पिता गोपालकृष्ण इंटरमीडिएट बोर्ड पर मुकदमा करना चाहते हैं. उन्होंने
बताया, "ऐसी बातों से हमें संदेह होता है. लेकिन मेरी तरह जिन लोगों ने अपने बच्चों को खो दिया है, उनके लिए इन बातों के क्या मायने रह गए हैं."
गोपालकृष्ण
बताते हैं, "मेरी बेटी फेल होना भी स्वीकार कर सकती थी. मैं ये जानना चाहता हूं कि किन लोगों ने उसे इस मुकाम तक पहुंचाया. मेरी बेटी की मौत का
जिम्मेदार आखिर कौन है."
धर्मा राम की मां विजयालक्ष्मी गुस्से से कहती हैं, "मैंने गर्भावस्था से ही संघर्ष किया था. लेकिन अब
मैंने अपना बेटा खो दिया है. वो बेहद प्यारा था. वह इस बात को पचा नहीं पाया कि वह किसी चीज में फेल भी हो सकता है."
वहीं, उसके
दोस्त अभिराम का मानना है कि छात्रों पर समाज की उम्मीदों का बड़ा दबाव है. उन्होंने बताया, "जब हमलोग अच्छे नंबर लाने लगते हैं तो उम्मीद की जाने
लगती है कि आने वाली परीक्षाओं में और भी बेहतर नंबर होंगे. कोई हमें यह नहीं बताता है कि अंत में सब अच्छा ही होता है."
23
छात्रों की आत्महत्या और उसके बाद के विरोध प्रदर्शन को देखते हुए एक याचिका दाखिल की गई. अदालत ने मामले में दखल देते हुए इंटरमीडिएट बोर्ड को उत्तर पुस्तिकाओं की फिर से जांच करने को कहा. 9.74 लाख छात्र परीक्षा में
शामिल हुए थे, जिनमें 3.28 लाख छात्र फेल हुए हैं.
इंटरमीडिएट
के पहले साल में करीब 60.5 प्रतिशत बच्चे पास हुए हैं जबकि इंटरमीडिएट के दूसरे साल में करीब 64.8 प्रतिशत बच्चे पास करने में कामयाब रहे. 2018 में इंटरमीडिएट पहले साल की परीक्षा में 62.73 प्रतिशत बच्चे पास हुए थे जबकि इंटरमीडिएट के दूसरे साल में 67.06 प्रतिशत. 2017 में पहले साल करीब 57.3
प्रतिशत वहीं दूसरे साल में 67 प्रतिशत छात्र कामयाब हुए थे.
18
अप्रैल को नतीज़े आने के बाद से बच्चों के अभिभावक उत्तर पुस्तिकाओं की जांच और अंक देने की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं. 19 अप्रैल से
वेणुगोपाल रेड्डी हर दिन इंटरमीडिएट बोर्ड के चक्कर लगा रहे हैं. उनका बेटा, मैथ्स, फीजिक्स और केमेस्ट्री स्ट्रीम में पढ़ रहा था.
वेणुगोपाल
रेड्डी बताते हैं, "मेरे बेटे ने पहले साल में मैथ्स में 75 में 75 अंक हासिल किए थे. जबकि फीजिक्स और केमेस्ट्री में उसे 60-60 अंक हासिल हुए थे.
इस साल के नतीजे में उसे मैथ्स और केमेस्ट्री में एक-एक अंक मिले हैं जबकि
फीजिक्स में शून्य. ये कैसे संभव है. मेरा बेटा दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रहा है. इस नतीजे को देखकर वो हताश हो गया है. उसने खाना-पीना सब छोड़ दिया है. वह घर से बाहर तक नहीं निकल रहा है. मुझे उसके मानसिक स्वास्थ्य की बहुत चिंता हो रही है."
ये सब बताते हुए वेणुगोपाल की आंखों से आंसू निकल आते हैं.
मुख्यमंत्री
ने समीक्षा बैठक करने के बाद बोर्ड के अधिकारियों को बिना किसी अतिरिक्त शुल्क लिए फिर से कॉपी जांचने के निर्देश दिए हैं.
बोर्ड ने
उन बच्चों की उत्तर पुस्तिकाओं के पुर्नमूल्यांकन को प्राथमिकता दी है जिन्होंने आत्महत्या कर ली है. बोर्ड अधिकारियों ने अपने बयान में कहा है, "आत्महत्याओं को लेकर बोर्ड संवेदना जताता है. हम ये मानते हैं कि
माता-पिता को ऐसा नुकसान हुआ जिसकी भरपाई नहीं हो सकती. लेकिन ये स्पष्ट किया जाता है कि छात्रों की आत्महत्या और रिजल्ट में किसी तकनीकी खामी और गलती के बीच कोई संबंध नहीं है."
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